भारतीय संविधान के विकास का क्रम| Historical Background Of Indian Constitution|

 
भारतीय संविधान के विकास का क्रम , भारत के संवैधानिक विकास का क्रम
भारतीय संविधान के विकास का क्रम
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
आज की इस शानदार पोस्ट में आप लोग “भारतीय संविधान के विकास का संक्षिप्त इतिहास, भारतीय संविधान के विकास का वर्णन कीजिए,भारतीय संविधान के विकास के चरण, भारत का संवैधानिक विकास क्या है, भारत के संवैधानिक विकास के प्रमुख चरण, भारत के संवैधानिक विकास की पक्रिया, भारत के संवैधानिक विकास की पृष्ठभूमि आदि प्रश्नों  के जवाब पाने वाले हैं|
वैसे तो यह concept पढ़ने में बहुत बड़ा है लेकिन हमने इसमें पोस्ट को छोटा करने के साथ साथ इसमें उन सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं को शामिल करने का प्रयास किया है जो की किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की दृष्टि से important है, ताकि हमारी पोस्ट को पढ़ने के बाद आपको कही और जाने की जरूरत न पड़े|
 आप बस इस पोस्ट को पूरा लास्ट तक पढ़े ताकि भारत के संवैधानिक विकास के क्रम से संबंधित कोई भी प्रश्न छूट न पाए|

भारतीय संविधान के विकास के प्रमुख चरण (भारतीय संविधान का विकास क्रम):

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सबसे पहले हम जानते हैं कि सन 1600 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की गई थी और इसे ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ प्रथम द्वारा रॉयल चार्टर द्वारा अनुमति दी गई थी कि वे पूर्वी देशों के साथ व्यापार कर सकते हैं|

उस समय भारत के शासक अकबर थे जिनका शासनकाल 1605 ईस्वी तक था| 1600ई में ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार करने भारत आई, 1605 के बाद 1707 ईसवी तक भारत का शासक औरंगजेब था तब तक ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में एक व्यापारी कंपनी के रूप में ही कार्य कर रही थी|

औरंगजेब की मृत्यु के बाद भारत में शासन, प्रशासन डगमगाने लगा और सभी क्षेत्र छोटे-छोटे क्षेत्रों में विभाजित होने लगे| इसका कंपनी ने जमकर फायदा उठाया और धीरे-धीरे भारत पर कब्जा करना शुरू कर दिया|

कंपनी को महत्वपूर्ण सफलता 1757 के प्लासी के युद्ध और 1764 ईसवी के बक्सर के युद्ध में मिलती है|

इसके बाद 12 अगस्त 1765 की इलाहाबाद की संधि के तहत कंपनी ने 1765 में बंगाल बिहार और उड़ीसा के दीवानी अधिकार प्राप्त कर लिए|इसके बाद भारत पर अपने शासन को और मजबूत करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने भारत में समय-समय पर कई एक्ट पारित किए|जो कि निम्न है –

1) कंपनी का शासन (1773 – 1858)

2) सम्राट का शासन (1858 – 1947) 

कंपनी का शासन (भारतीय संविधान का विकास क्रम) :

1773 का रेगुलेटिंग एक्ट (Regulating Act Of 1773):

★ भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों को नियमित और नियंत्रित करने की दिशा में ब्रिटिश सरकार द्वारा उठाया गया यह पहला कदम था|

★ ईस्ट इंडिया कंपनी पर ब्रिटिश संसदीय नियंत्रण की शुरुआत हुई|

★ केंद्रीय करण अथवा केंद्रीय प्रशासन की शुरुआत हुई|

★ इसके द्वारा मद्रास एवं मुंबई के गवर्नर को बंगाल के गवर्नर जनरल के अधीन कर दिया गया|

★ इस प्रकार बंगाल पर अधिक कामकाज बढ़ने के कारण उसकी सहायता के लिए एक चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया|

★ बंगाल के गवर्नर को “बंगाल का गवर्नर जनरल” नाम दिया गया|

★ अतः बंगाल का अंतिम गवर्नर और प्रथम गवर्नर जनरल लॉर वारेन हेस्टिंग्स था|

★ इसके अंतर्गत 1774 में कोलकाता में एक उच्च न्यायालय की स्थापना की गई जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश (एलिजाह इम्तपे) था तीन अन्य न्यायाधीश (चैंबर्स, लिमेन्स्टर, हाइड) थे|

★ कंपनी के कर्मचारियों को निजी व्यापार करने और भारतीयों से उपहार लेने, रिश्वत लेने पर प्रतिबंध लगा दिया गया|

★ “बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स” की शुरुआत हुई जिसने भारत में राजस्व नागरिक और सैन्य मामलों की जानकारी ब्रिटिश सरकार को देना आवश्यक कर दिया|

1781 का एक्ट ऑफ सेटलमेंट (Act Of Settlement 1781) :

1773 के रेगुलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करने के लिए ब्रिटिश संसद ने 1781 का एक्ट ऑफ सेटलमेंट पारित किया|

★ इसके तहत गवर्नर जनरल तथा उसकी काउंसिल (कार्यकारिणी) को सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार से मुक्त कर दिया गया|

★ इसके तहत राजस्व और राजस्व वसूली मामलों को भी सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार से मुक्त कर दिया गया|

★ प्रांतीय न्यायालय अब सर्वोच्च न्यायालय में नहीं बल्कि गवर्नर जनरल इन काउंसिल में अपील कर सकते थे|

★ कोलकाता की सरकार को बंगाल, बिहार और उड़ीसा के लिए भी विधि बनाने का अधिकार प्रदान किया गया|

 

1784 का पिट्स इंडिया एक्ट (Pitts India Act 1784) :

यह भी 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट की खामियों को दूर करने के लिए ही बनाया गया था|

★ इसने कंपनी के राजनीतिक और वाणिज्यिक कार्यों को अलग अलग कर दिया|

★ दोहरी शासन प्रणाली की शुरुआत हुई (1858 में समाप्त कर दी गई)|

★ कंपनी के राजनीतिक मामलों के लिए “बोर्ड ऑफ कंट्रोल” की स्थापना की गई|(“बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स” व्यापारिक मामलों के लिए)

★ कंपनी प्रशासित क्षेत्र को पहली बार “ब्रिटिश राज्य क्षेत्र” कहा गया|

★ गवर्नर जनरल के परिषद की सदस्य संख्या 4 से घटाकर 3 कर दी गई|

1786 का अधिनियम (Act Of 1786) :

1786 में “लॉर्ड कॉर्नवालिस” को बंगाल का गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया| पद स्वीकार करने से पहले उसने दो शर्ते रखी-

★ उसे विशेष मामलों में अपनी काउंसिल के निर्णयों को अस्वीकारने (ना मानने) का अधिकार हो|

★ उसे सेनापति अथवा commander-in-chief का पद भी दिया जाए|

1793 का चार्टर एक्ट (Charter Act Of 1793):

★ इसमें लॉर्ड कॉर्नवालिस को दी गई काउंसिल के निर्णय को अस्वीकारने की शक्ति को भविष्य के सभी गवर्नरों तक विस्तारित कर दिया गया|

★ कंपनी द्वारा भारत के साथ व्यापार को 20 वर्षों के लिए और बढ़ा दिया गया|

★ इसमें तय हुआ कि बोर्ड ऑफ कंट्रोल तथा उनके कर्मचारियों को भारतीय राजस्व से ही भुगतान किया जाएगा|

1813 का चार्टर एक्ट (Charter Act Of 1813) :

★ कंपनी से भारत के साथ व्यापार के एकाधिकार को छीन लिया गया यानी भारतीय व्यापार को अब सभी ब्रिटिश व्यापारियों के लिए खोल दिया गया लेकिन चाय तथा चीन के साथ व्यापार का एकाधिकार इसका बना रहा|

★ ‘ईसाई मिशनरियों’ को भारत में धर्म प्रचार करने की अनुमति दे दी गई|

★ कंपनी द्वारा शिक्षा पर प्रत्येक वर्ष ₹1,00,000 खर्च करने का प्रावधान किया गया|

1833 का चार्टर एक्ट (Charter Act Of 1833) :

★ चाय और चीन के साथ व्यापार पर कंपनी के अधिकार को समाप्त कर दिया गया|

★ कंपनी के व्यापारिक अधिकार को पूर्णता समाप्त कर दिया गया ,अब ईस्ट इंडिया कंपनी ‘प्रशासनिक निकाय’ बन गई|

★ बंगाल के गवर्नर जनरल को “भारत का गवर्नर जनरल” कहा जाने लगा|

★ इस प्रकार बंगाल का अंतिम गवर्नर जनरल तथा भारत का प्रथम गवर्नर जनरल “लॉर्ड विलियम बेंटिक” हुआ|

★ गवर्नर जनरल को संपूर्ण देश के लिए एक ही बजट तैयार करने का प्रावधान बनाया गया|

★ कंपनी के ऊपर कर्ज की जिम्मेदारी भारत सरकार ने अपने ऊपर ले ली|

★ “प्रथम विधि आयोग” का गठन किया गया| (अध्यक्ष – लॉर्ड मैकाले)

★ दास प्रथा के उन्मूलन के लिए निर्देश दिए गए| (1845 में लॉर्ड एलनबरो द्वारा पूर्ण उन्मूलन) (समाप्ति)

★कंपनी के सभी सिविल पदों पर नियुक्ति के लिए भारतीयों के साथ भेदभाव की समाप्ति की बात कही गई| (हालांकि “बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स” के विरोध के कारण इस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया)

 

1853 का चार्टर एक्ट (Charter Act Of 1853) :

★ इसने सिविल सेवा और चयन के लिए खुली प्रतियोगिता की व्यवस्था सभी भारतीयों के लिए खोल दी| (1854 की मैकाले समिति के द्वारा)

★ इस एक्ट के माध्यम से कार्यपालिका एवं विधायिका संबंधी शक्तियों का पृथक्करण किया गया|

★ इस अधिनियम के माध्यम से भारत में पहली बार विधान परिषद की स्थापना की गई|

★ संसद द्वारा कंपनी का शासन किसी भी समय समाप्त किया जा सकता था|

सम्राट का शासन (1858–1947) :

1858 का भारत शासन अधिनियम (Government of India Act of 1858) :

इस महत्वपूर्ण कानून का निर्माण 1857 के विद्रोह के बाद किया गया, जिसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम या सिपाही विद्रोह भी कहा जाता है|

★ इस कानून के तहत भारत पर शासन करने का अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर ब्रिटिश का क्राउन को दे दिया गया|

★ इसके अंतर्गत भारत के ‘गवर्नर जनरल’ को अब ‘वायसराय’ कहा जाने लगा| अतः भारत के अंतिम गवर्नर जनरल तथा प्रथम वायसराय “लॉर्ड कैनिंग” हुए|

★ इस एक्ट को “गुड गवर्नेंस एक्ट” भी कहा जाता है|

★ बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स (BOD) और बोर्ड ऑफ कंट्रोल (BOC) की समाप्ति| अर्थात द्वैध शासन की समाप्ति|

★ एक नए पद “भारत सचिव” की स्थापना की गई जो अपने कार्यों के लिए ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदाई होता था तथा इसकी सहायता के लिए 15 सदस्य वाली भारत परिषद की स्थापना की गई|

1861 का भारत परिषद अधिनियम (India Council Act of 1861) :

1857 की महान क्रांति के बाद ब्रिटिश सरकार ने महसूस किया कि भारत पर शासन चलाने के लिए भारतीयों का सहयोग लेना आवश्यक है इस आधार पर ब्रिटिश संसद ने 1861,1892 और 1909 में तीन अधिनियम पारित किए|

★ 1859 में ऑर्डिनेंस सिस्टम की शुरूआत (लॉर्ड कैनिंग द्वारा)

★ वायसराय को पहली बार अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान की गई|

★ पोर्टफोलियो सिस्टम (विभागीय प्रणाली) की शुरुआत हुई यानी वायसराय की काउंसिल के किसी भी सदस्य को किसी  विभाग का प्रमुख बना दिया गया|

★ विकेंद्रीकरण की शुरुआत हुई अर्थात मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी को उनकी विधाई शक्ति पुनः वापस कर दी गई|

★ वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में भारतीयों को गैर सरकारी सदस्यों के रूप में नियुक्त किया जाने लगा|

★ बंगाल ,उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत तथा पंजाब में विधान परिषद की स्थापना की गई|

1892 का भारत परिषद अधिनियम (India Council Act of 1892) :

★ “अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली” की शुरुआत हुई|

★ व्यवस्थापिका सभा के सदस्यों को बजट पर बहस करने, प्रश्न पूछने का अधिकार तो था लेकिन वोट देने का अधिकार नहीं था|

1909 का भारत परिषद अधिनियम (मार्ले मिंटो सुधार) (India Council Act Of 1909) :

★ इसमें मार्ले ‘भारत सचिव’ था तथा मिंटो ‘वायसराय’ था|

★ गवर्नर जनरल (वायसराय) की कार्यकारी परिषद में प्रथम बार भारतीय की नियुक्ति (सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा – विधि सदस्य) की गई|

★ मुस्लिम समुदाय के लिए “प्रथक प्रतिनिधित्व” की स्थापना की गई अर्थात किसी मुस्लिम सदस्य के चुनाव में केवल मुस्लिम ही वोट दे सकते हैं|

★ यह सब लॉर्ड मिंटो (वायसराय) के शासनकाल में हुआ, अतः उसे “संप्रदायिक निर्वाचन का जनक” माना जाता है|

★ लॉर्ड मिंटो को “पाकिस्तान का जन्मदाता” कहां गया| (डॉ राजेंद्र प्रसाद द्वारा)

★ व्यवस्थापिका सभा के सदस्यों को सार्वजनिक विषयों पर प्रस्ताव पेश करने, प्रश्न पूछने और वोट देने का अधिकार भी दिया गया|

1919 का भारत शासन अधिनियम (मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार),(Government of India Act of 1919)  :

★ इसमें मोंटेग्यू “भारत सचिव” तथा चेम्सफोर्ड “वायसराय” था|

★ प्रांतों में द्वैध शासन की शुरुआत हुई| (प्रांतों में द्वैध शासन के जनक (लियोन्स कार्टियस) को कहा जाता है|

★ अर्थात इस अधिनियम के द्वारा पहली बार देश में द्विसदनीय प्रणाली (द्वैध शासन) लोकसभा और राज्यसभा का गठन किया गया|

★ “प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली” की शुरुआत हुई|

★ इसमें प्रांतीय विषयों को दो भागों में विभाजित कर दिया – हस्तांतरित और आरक्षित|

हस्तांतरित विषयों पर गवर्नर उन मंत्रियों की सहायता से शासन करता था जो विधान परिषद के प्रति उत्तरदाई थे|

और आरक्षित विषयों पर गवर्नर कार्यपालिका परिषद की सहायता से शासन करता था जो विधान परिषद के प्रति उत्तरदाई नहीं थी|

★ भारत के “उच्चायुक्त पद” का सृजन इसी वर्ष हुआ|

★ सिखों, आंग्ल भारतीयों और ईसाइयों को भी पृथक प्रतिनिधित्व के अधिकार दिए गए|

★ महिलाओं को पहली बार मत देने का अधिकार दिया गया| (लेकिन सभी महिलाओं के लिए नहीं)

★ 1926 में “ली आयोग” की सिफारिश पर सिविल सेवकों की भर्ती के लिए “केंद्रीय लोक सेवा आयोग” का गठन किया गया|

★ “वैधानिक आयोग” का गठन किया गया, जिसका कार्य 10 वर्ष पश्चात जांच करके अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करना था|

★ राज्य बजट को केंद्रीय बजट से अलग कर दिया गया अर्थात कहां गया कि राज्य विधानसभा अपना बजट अब खुद तैयार कर सकती है|

 

1935 का भारत शासन अधिनियम (Government of India Act of 1935) :

★ प्रांतों में द्वैध शासन की समाप्ति कर दी गई और स्वशासन का अधिकार दे दिया गया|

★ केंद्र में द्वैध शासन की शुरुआत की गई|

★ “अखिल भारतीय संघ” की स्थापना का प्रावधान लाया गया|

★ बर्मा (म्यांमार) को भारत से अलग कर दिया गया|(1885 में म्यांमार को भारत में मिलाया गया था)

★ उड़ीसा को बिहार से अलग कर दिया गया|

★ दिल्ली में एक “संघीय न्यायालय” की स्थापना की गई|

★ 1 अप्रैल 1935 में केंद्रीय बैंक (रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया) की स्थापना की गई|

★ भारत परिषद को समाप्त कर दिया गया| (1858 में शुरुआत हुई थी)

★ इस अधिनियम के तहत विषयों को तीन श्रेणियों में विभाजित कर दिया गया – संघ सूची ,राज्य सूची और समवर्ती सूची|

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 (Indian Independence Act 1947) :

20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री “क्लीमेंट एटली” ने घोषणा की कि 30 जनवरी 1947 को भारत ब्रिटिश शासन से समाप्त हो जाएगा| इस घोषणा पर मुस्लिम लीग ने भारत-पाकिस्तान के विभाजन की बात कही| 3 जून 1947 को वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने एक योजना पेश की जिसे “माउंटबेटन योजना” कहा गया| इस योजना को मुस्लिम लीग और कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया और भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 बनाकर उसे लागू कर दिया गया|

★ इस अधिनियम ने ब्रिटिश राज समाप्त कर भारत को एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र घोषित कर दिया|

★ इस अधिनियम ने भारत का विभाजन कर दो नए राष्ट्र भारत और पाकिस्तान का निर्माण किया और देसी रियासतों को यह स्वतंत्रता दी कि वह चाहे तो भारतीय पाकिस्तान में मिल सकती है या फिर स्वतंत्र रह सकती है|

★ इसने दोनों राज्यों की संविधान सभा को अपना खुद का संविधान बनाने और उसके लिए किसी भी देश के संविधान को अपनाने की शक्ति दी और यह भी कहा कि वह किसी भी ब्रिटिश कानून को समाप्त करने के लिए भी कानून बना सकती है|

★ इस अधिनियम ने “भारत का सम्राट” शब्द समाप्त कर दिया|

★ इसने “वायसराय” का पद समाप्त कर दिया और गवर्नर जनरल के पद का सृजन किया|

★ इसने “भारत सचिव” के पद को समाप्त कर दिया|

★ इसमें भारत सचिव द्वारा सिविल सेवा में नियुक्तियां करने और पदों में आरक्षण करने की प्रणाली को समाप्त कर दिया हालांकि 15 अगस्त 1947 से पूर्व के सिविल सेवा कर्मचारियों को वही सुविधाएं मिलती रही जो उन्हें पहले से मिल रही थी|

★ स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल “लॉर्ड माउंटबेटन” बने|

तो ये थे भारतीय संविधान के विकास के प्रमुख चरण|

तो दोस्तो यदि आपने पूरी पोस्ट ध्यान से पढ़ी होगी तो आपको पता होगा की कोई भी टॉपिक छूट नही पाया है, हर Topic के बारे में बड़ी आसान भाषा में बताने का प्रयास किया गया है|

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